आप ट्रिप बुक करने से पहले बस तीन नंबर देख लें—और 10 मिनट में पता चल जाएगा कि यह ट्रिप “हां” है या “अभी नहीं”। यही सबसे आसान तरीका है, क्योंकि ट्रिप का सवाल पैसों से कम और टाइमिंग + बफर से ज़्यादा जुड़ा होता है।
सबसे याद रखने वाली बात: ट्रिप की कीमत नहीं, आपका “बफर” तय करता है कि आप जा सकते हैं या नहीं।
3-नंबर बजट टेस्ट (कागज़ पर, एक बार में)
यह टेस्ट “अंदाज़ा” नहीं करता—यह आपकी असली स्थिति दिखाता है। तीन नंबर लिखिए:
-
T = ट्रिप का All-in कुल खर्च
सिर्फ फ्लाइट/होटल नहीं। इसमें जोड़ें: लोकल ट्रांसपोर्ट, खाना, टिकट/एंट्री, शॉपिंग/गिफ्ट, वीज़ा/इंश्योरेंस (अगर लागू), और “छोटी-छोटी” चीज़ें।
फिर एक कुशन जोड़ें: कुल का 10–20% (क्योंकि ट्रिप पर खर्च हमेशा थोड़ा फैलता है—जैसे दाल में नमक कम लगे तो आप फिर डालते हैं, और अंत में ज्यादा हो जाता है)। -
E = घर का मासिक जरूरी खर्च (Essentials)
यह वो खर्च है जो ट्रिप हो या न हो, चलता ही है: किराया/EMI, बिल, राशन, दवाइयां, बच्चों/परिवार की बेस जरूरतें, जरूरी ट्रांसपोर्ट।
यहां “अच्छा लगे तो” वाले खर्च मत डालें। यह सिर्फ “मुझे हर हाल में देना है” वाला नंबर है। -
B = आपका सेफ्टी बफर (Buffer)
यह वो पैसा है जो ट्रिप के लिए नहीं, बल्कि “कुछ गड़बड़ हो गई” के लिए है—जैसे चोट, काम में गैप, घर का बड़ा खर्च।
इसे ऐसे सोचें: किचन में हमेशा थोड़ा “स्टॉक” होता है—आज बाजार बंद हो जाए तो भी 1–2 दिन खाना बन जाए। पैसों में भी वही स्टॉक चाहिए।
पास/फेल नियम (बहुत सीधा)
अब तीन चेक लगाइए:
चेक #1: ट्रिप का पैसा कहां से आ रहा है?
- अगर T आप सेविंग/डिस्पोजेबल से दे रहे हैं, ठीक।
- अगर T देने के लिए आपको B (सेफ्टी बफर) तोड़ना पड़ रहा है, लाल झंडा।
चेक #2: ट्रिप के बाद भी “एक महीने की सांस” बचती है?
- नियम: ट्रिप बुक करने के बाद भी आपका बफर कम-से-कम 1× E रहे।
यानी ट्रिप के बाद भी आपके पास एक महीने के जरूरी खर्च जितना “शांति पैसा” बचा हो।
(कुछ लोगों के लिए 2× E बेहतर है—अगर नौकरी/इनकम अनिश्चित है।)
चेक #3: अगले 30 दिनों में कैश-फ्लो टूट तो नहीं रहा?
ट्रिप अक्सर “डबल हिट” देती है: पहले भुगतान, फिर वापस आकर सामान्य खर्च + थकान में ज़्यादा ऑर्डर/कैब।
अगर ट्रिप के अगले महीने में आपको जरूरी खर्च चलाने के लिए उधार/क्रेडिट पर निर्भर होना पड़ेगा, तो ट्रिप अभी भारी है।
अगर आप तीनों चेक पास करते हैं, तो आमतौर पर ट्रिप अफ़ॉर्डेबल है। अगर एक भी चेक फेल हो, तो ट्रिप का मतलब “कभी नहीं” नहीं—बस “अभी नहीं, या छोटा/स्मार्ट वर्ज़न” है।
लोग सबसे ज्यादा क्या गलत करते हैं?
सबसे आम गलती: लोग T तो सोच लेते हैं, लेकिन E और B को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
यानी वे ट्रिप को “एक बार का खर्च” मानते हैं, जबकि असल में ट्रिप आपके सिस्टम को हिला देती है—जैसे आप किचन का सारा स्टॉक एक पार्टी में लगा दें, और अगले हफ्ते रोज़मर्रा में परेशानी शुरू हो जाए।
फिक्स: ट्रिप को “खर्च” नहीं, टाइमिंग टेस्ट मानिए—क्या ट्रिप के बाद आपकी बेस लाइफ आराम से चल रही है?
अगर आपकी स्थिति अलग है, तो यह ट्विस्ट काम आएगा
-
इनकम अनियमित है (फ्रीलांस/बिज़नेस/कमीशन):
E को “सबसे खराब महीने” के हिसाब से रखें, और B को 2× E की तरफ झुकाएं। यहां सुरक्षा ज़्यादा मायने रखती है। -
क्रेडिट कार्ड/EMI पर ट्रिप का प्लान है:
यह तभी ठीक है जब आप पहले से जानते हों कि अगले 1–2 स्टेटमेंट में भुगतान बिना बफर तोड़े हो जाएगा। वरना “ट्रिप का मज़ा” बाद में “किस्तों की चुभन” बन जाता है। -
आपको ट्रिप चाहिए, पर T बड़ा है:
“छोटा ट्रिप, बड़ा सुकून” वाला रास्ता लें: दिनों की संख्या घटाएं, ऑफ-सीज़न चुनें, एक-एक दिन का खर्च फिक्स करें (जैसे 50/30/20 में 30% वाला हिस्सा), और कुशन बनाए रखें।
एक छोटा सा टूल-लेवल सच
ये तीन नंबर तभी साफ निकलते हैं जब आप अपने खर्च ट्रैक करते हों—मतलब, “मुझे लगता है” नहीं, “मेरे असली नंबर”। (Monee जैसी ट्रैकिंग आदत यहां बस आधार है; नियम बाद में आते हैं।)
अंत में बात सीधी है: ट्रिप का फैसला भावनाओं से शुरू हो सकता है, लेकिन हां/ना का जवाब T, E, B से ही तय होना चाहिए—क्योंकि यही तीन नंबर आपकी आज़ादी और आपकी सुरक्षा, दोनों को एक साथ बचाते हैं।

