एक्सटेंडेड वारंटी पर मेरा एक सीधा नियम है: “तभी खरीदो जब ब्रेक‑ईवन संभावना आपके अनुमान से कम से कम 2× अधिक लगे।”
यानी, अगर वारंटी “अपने आप वसूल” होने के लिए जितनी खराबी‑संभावना चाहिए, आपकी वास्तविक अनुमानित संभावना उससे दोगुनी नहीं लगती—तो छोड़ दो। यह नियम आपको एक ही बार में “क्यों” और “कब नहीं” दोनों बता देता है।
एक लाइन में ब्रेक‑ईवन टेस्ट (Bao Rule)
ब्रेक‑ईवन संभावना = वारंटी का कुल खर्च ÷ (कवर होने वाली औसत मरम्मत लागत × कवरेज प्रतिशत)
- वारंटी का कुल खर्च = जो भी आप कुल में दे रहे हैं (टैक्स/फीस सहित), बस एक संख्या मान लीजिए।
- कवरेज प्रतिशत = वारंटी वास्तव में कितना भरती है (कटौती/डिडक्टिबल, सर्विस फीस, पार्ट्स‑लेबर सीमाएँ, “केवल कुछ चीजें” जैसी शर्तें घटाकर)।
- औसत मरम्मत लागत = उस बड़ी खराबी का “टिपिकल” खर्च जो आप डर रहे हैं (एक नहीं, सामान्य औसत)।
फिर तुलना करें:
- अगर आपकी अनुमानित खराबी‑संभावना ≥ 2 × ब्रेक‑ईवन संभावना, तो खरीदना समझ में आता है।
- अगर नहीं, तो मत खरीदो—आप मूलतः “चिंता कम करने का प्रीमियम” दे रहे हैं।
यह नियम क्यों काम करता है (और आपको क्या याद रखना है)
वारंटी का मतलब है: आप निश्चित नुकसान (वारंटी खर्च) देकर अनिश्चित नुकसान (मरम्मत) हटाते हैं।
ब्रेक‑ईवन टेस्ट बस यह पूछता है: “क्या मेरा जोखिम इतना बड़ा है कि यह सौदा गणित से भी सही बैठे?”
और “2×” वाला हिस्सा इसलिए है क्योंकि:
- आपकी संभावना का अनुमान अक्सर गलत होता है,
- शर्तें अक्सर उम्मीद से कम भरती हैं,
- “कवर है” और “क्लेम पास हुआ” अलग चीजें हैं।
पॉकेट‑कार्ड: ब्रेक‑ईवन टेस्ट
नियम: खरीदो तभी जब
P(खराबी) ≥ 2 × [W ÷ (R × C)]
कब इस्तेमाल करें: जब वारंटी वैकल्पिक हो और बड़ी मरम्मत का डर हो
कब न करें: जब शर्तें अस्पष्ट हों, कवरेज “चुनिंदा” हो, या आप क्लेम‑प्रोसेस पर भरोसा न कर पाएं
कैसे एडाप्ट करें:C(कवरेज %) को सख्ती से कम मानें,R(मरम्मत) को औसत रखें, और “2×” को “3×” करें अगर जानकारी कम हो
3 मिनी‑सीनारियो (बिना मुद्रा, सिर्फ प्रतिशत/वेरिएबल्स)
सीनारियो 1: साफ‑सुथरा केस
- वारंटी खर्च =
W - बड़ी मरम्मत का औसत =
R - वास्तविक कवरेज (शर्तें घटाकर) =
C = 80%
ब्रेक‑ईवन: P* = W ÷ (R × 0.8)
मान लीजिए यह P* = 15% आता है।
Bao Rule: खरीदो तभी जब आपको लगे P(खराबी) ≥ 30%।
अगर आपका ईमानदार अनुमान 10–20% है, तो छोड़ना बेहतर है।
सीनारियो 2: “कवर है” लेकिन असल में कम भरता है
- डिडक्टिबल/फीस/सीमाएँ जोड़कर प्रभावी कवरेज गिरकर
C = 50%हो जाती है। - बाकी सब वही:
W,R
अब ब्रेक‑ईवन: P* = W ÷ (R × 0.5) — यानी पहले से 1.6× ज्यादा (क्योंकि 0.8 से 0.5)।
यहाँ लोग गलती करते हैं: वे C को 100% मान लेते हैं।
Bao Version: कवरेज को कभी 60% से ऊपर मत मानो जब तक शर्तें बिल्कुल साफ न हों।
सीनारियो 3: आप जोखिम उठा सकते हैं या नहीं?
यह गणित नहीं, आपकी “झटका सहने की क्षमता” है। एक सुरक्षित चेक:
- अगर उस संभावित मरम्मत का झटका आपके लिए “बहुत बड़ा” है, तो गणित पास न भी हो, आप सुरक्षित वैरिएंट अपनाएँ।
सुरक्षित वैरिएंट:
- वारंटी लेने के बजाय/साथ में, अपने रखरखाव/आपात फंड को ऐसा रखें कि कम से कम 2–3 pay cycles तक आप बिना तनाव चल सकें, और
- “अधिकतम संभावित मरम्मत” का कम से कम 50% आप खुद संभाल सकें।
यह आपको वारंटी की क्लेम‑अनिश्चितता से कम बाँधता है।
यह नियम कहाँ फेल होता है (ईमानदारी से)
-
आप P(खराबी) का अनुमान नहीं लगा पाते: नया मॉडल, कम डेटा, या आपकी उपयोग‑शैली असामान्य।
- तब “2×” को 3× कर दें, या फैसला “नो” मान लें।
-
कवरेज शर्तें धुंधली हैं: “वियर‑एंड‑टियर नहीं”, “कंज़्यूमेबल नहीं”, “अनधिकृत सर्विस नहीं” जैसी लाइनें अक्सर असली केस काट देती हैं।
- तब
Cको 30–50% मानकर ही टेस्ट चलाएँ।
- तब
-
मरम्मत लागत R बहुत फैलाव वाली है: कभी छोटी, कभी बहुत बड़ी।
- तब
Rको “औसत” नहीं, “वेटेड औसत” की तरह सोचें: बड़ी खराबी की लागत × उसकी संभावना, और छोटी‑छोटी चीजें अलग रखें (वे अक्सर कवर नहीं होतीं)।
- तब
Common mistakes (जो लोग सबसे ज्यादा करते हैं)
- 100% कवरेज मान लेना: असल में
Cअक्सर 40–80% के बीच होता है। - ब्रेक‑ईवन को “गारंटी” समझना: यह सिर्फ बराबरी की लाइन है; अनिश्चितता के लिए मार्जिन चाहिए (इसीलिए 2×)।
- क्लेम‑फ्रिक्शन भूल जाना: समय, दस्तावेज़, अनुमोदन—ये सब “हिडन कॉस्ट” हैं।
- गलत डर पर खरीदना: आप जिस खराबी से डरते हैं, वही कवर हो—यह चेक किए बिना मत मानिए।
Bottom line (एक वाक्य याद रखें)
एक्सटेंडेड वारंटी तभी लो जब आपकी अनुमानित खराबी‑संभावना, ब्रेक‑ईवन संभावना से कम से कम 2× ज्यादा लगे—और शर्तें साफ हों; वरना छोड़ो और सुरक्षित वैरिएंट अपनाओ।

